……बड़ा ही अजीब इत्तेफाक था। वो गुरूजी थे जिनसे मुलाक़ात करनी थी और वो भी गुरूजी ही थे जिन्हे खोजना था। एक गुरूजी का पता मालूम था,दूसरे का पता मालूम करना था। इन दोनों गुरूजी से मेरा ना कोई काम था ना मिलने की कोई ख़्वाहिश। मैं तो बस अपने फक्कड़पन कहूँ या घुमन्तु प्रवित्ति के चलते उन दोनों गुरुओं के पास जा रहा था। बिलासपुर से करीब १९८ किलोमीटर दूर थे वो गुरुजन.... पोड़ीबछेरा [कोरिया] में। काम मेरे मित्र महेश को था,मैं अपना काम छोड़कर महेश के साथ जा रहा था। महेश एक ऑटोमोबाइल कंपनी में सेल्स मेनेजर है। लोग जूता-चप्पल,टीवी-फ्रीज़,कपडा-मोबाइल ,आम-अमरुद,तरबूज-खरबूज बेचते है महेश छोटी-बड़ी कार बेचता है। चूँकि सेल्समेन है इस कारण बोलने और बेवकूफ बनाने की कला में पारंगत है। दिल का साफ़ महेश बिना बटन वाला टेप रिकार्ड है। एक बार शुरू हुआ तो बंद होने का नाम नही लेता। नई बातों के बीच पुरानी बातों को दोहराना मेरे मित्र की खूबी है। मेरी मुलाकात बहुत पुरानी नही है ,पर लगता ही नही की महेश से इसी मार्च महीने के आखिर में मिला हूँ। कोरबा आने-जाने के दौरान महेश ट्रेन में मिला।

आते ही कार को स्टार्ट कर महेश के मुँह से जो पहला शब्द निकला वो था ''सत्या भईया'' हम बेवकूफ बन गए,वैसे और भी बहुत कुछ कहाँ उसने। मैं समझ नही पाया मैंने पूछा अब क्या हुआ ? क्या हमको अब दूसरे गुरूजी के पास जाना है ? जवाब था नही...... वो दोनों गुरूजी एक ही हैं। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ.... पूछने पर मेरे मित्र का जवाब था भाई जिस सज्जन से अभी मुलाक़ात हुई उसने बिना गुरूजी का नाम बताये ये कहा था की एक गुरूजी है जो गाडी खरीदना चाहते है। मैंने कहा फिर इसमे गफलत कहाँ है.... महेश जी बोले भइए इसी गाँव के नारायण गुरूजी कुछ दिन पहले कोरबा आकर एक कार बुक करा गए थे लेकिन मैं उनका मोबाइल नंबर और घर का पता पूछना भूल गया था। जब गाँव वाले उस सज्जन ने कहीं से मेरा नंबर पाकर किसी गुरूजी के कार खरीदने की इच्छा का जिक्र किया तो मुझे लगा एक ही गाँव में दो गुरूजी कार ख़रीदने वाले है।
बस क्या था मैंने सोचा एक गुरूजी को कार का मॉडल दिखाकर सौदा तय कर लूंगा और जो बे पता गुरूजी है उनसे मुलाक़ात कर मोबाइल नंबर लेकर बुक कार को कब लेंगे ये पूछ लूंगा ? अफ़सोस..... दूसरी कार वाले गुरूजी ने तो चंद दिनों पहले ही कार बुक करवा ली है । हाँ मेरे मित्र को इस बात की संतुष्टी जरूर थी की उसे बे-पता गुरूजी का पता मिल गया साथ में मोबाइल नंबर। रास्ते भर उस सज्जन को भला-बुरा कहते हम बैकुण्ठपुर की ओर बढ़ गए। वहां से फिर पेण्ड्रा,केंवची के रास्ते शाम साढ़े सात बजे वापस बिलासपुर पहुँच गए। मौसम की नरमी गर्मी के बीच नान स्टॉप बोलते महेश को मैं रास्ते भर सिर्फ इतना ही कहता रहा........ गुरूजी तो एक ही थे।